भक्ति योग :आराध्या मीराबाई

भक्ति योग :आराध्या मीराबाई

भाया मोहन का रुप, जोडा रिश्ता अनूप कोई दूजा स्वरुप मीरा माने ना”
राजस्थान की मेडता की मीराबाई की भक्ति न केवल विश्व विख्यात है वरन् एक उदाहरण है भाव विह्वल हो स्वयँ के हृदय को खोलकर प्रस्तुत करने का .मीरा बाई जन्म से कवयित्री नही थी परँतु उनकी भक्ति भाव की विह्वलता ने उन्हे भक्ति मार्ग की एक बहुत बडी कवयित्रि बना दिया,कवयित्रि ने भक्ति भाव की अपने शब्दोँ मे अभिव्यक्ति की.
श्री कृष्ण को रिझाने के लिये अँतर्करण से पुकारना .यही मीरा के भक्ति पद है

“रे मोहन आवो तो सही गिरधर आवो तो सही माधव रे मँदिर मे मीरा बाई एकली खडी”

मीराबाई ने जन्मजात कवियित्री न होने के बावजूद भक्ति की भावना में कवियित्री के रुप में प्रसिद्धि प्रदान की। मीरा के विरह गीतों में समकालीन कवियों की अपेक्षा अधिक स्वाभाविकता पाई जाती है। इन्होंने अपने पदों में श्रृंगार और शांत रस का प्रयोग विशेष रुप से किया है
भावों की सुकुमारता और निराडंबरी सहजशैली की सरसता के कारण मीरा की व्यथासिक्त पदावली बरबस सबको आकर्षित कर लेती हैं

“मन रे पासि हरि के चरन।
सुभग सीतल कमल- कोमल त्रिविध – ज्वाला- हरन।
जो चरन प्रह्मलाद परसे इंद्र- पद्वी- हान।।
जिन चरन ध्रुव अटल कींन्हों राखि अपनी सरन।
जिन चरन ब्राह्मांड मेंथ्यों नखसिखौ श्री भरन।।
जिन चरन प्रभु परस लनिहों तरी गौतम धरनि।
जिन चरन धरथो गोबरधन गरब- मधवा- हरन।।
दास मीरा लाल गिरधर आजम तारन तरन।।“

मीरा की भक्ति की सुँदरता “माधुर्य” है,माधुर्य जो विरह की भावना से और भी अधिक सुँदर पडा है,मीरा बाई की भाव विह्वलता उनके पदोँ को और भी अधिर हृदयस्पर्शी बना देता है,योग का यह एक प्राकट्य स्वरुप है,जीवन के योगसूत्र को नवरसोँ मेँ अभिव्यक्त कर लेने वाला योग के अमूर्त स्वरुप को जानने वाला होता है और मीरा बाई की भावविह्वलता उनके भक्ति योग को सबसे अधिक सुँदर बना देती है
मीराबाई रैदास को अपना गुरु मानते हुए कहती हैं – गुरु मिलिया रैदास दीन्ही ज्ञान की गुटकी । मीरा ने गुरु के विषय में कहा है कि “बिना गुरु धारण किए भक्ति नहीं की जा सकती। भक्ति भाव से परिपूर्ण व्यक्ति ही प्रभु प्राप्ति का भेद बता सकता है, वही सच्चा गुरु है।“
उन्होंने गुरु रविदास को अपना गुरु माना। उन्होंने अनेकानेक साधु-संतो की संगत की।
नहिं मैं पीहर सासरे, नहिं पियाजी री साथ। मीरा ने गोबिन्द मिल्या जी, गुरु मिलिया रैदास॥
योग का रास्ता बिना मार्गदर्शन के तय नही किया जा सकता है और मीरा बाई ने अपने गुरु से बहुत सारा सीखते हुए भक्ति के परम स्वरुप को स्पर्श किया और विश्व के सामने भक्ति और माधुर्य का एक वरद उदाहरण प्रस्तुत किया
स्वयँ को जान लेना और स्वयँ की अमूर्त य़ात्रा पर निकल जाना ही योग है,मीरा बाई के भक्ति योग मे वे अपनी भक्ति से अलग दिखाई नही देती है वे और भक्ति दोनो एकाकर हो गये और यही भक्ति योग है
साहित्य की दृष्टिसे देखने पर मीरा बाई भक्ति कालीन युग की सगुण भक्ति की कवयित्रि मानी जाती है,ईश्वर के एसे स्वरुप से लडना झगडना और उसके विरह मे खोये रहना जिस ईश्वर की कल्पना और प्राप्ति के विषय मे बहुत कठिन मार्ग और तपस्या के सँदर्भ मे बहुत बडे बडे ग्रँथ लिखे गये .एसे ईश्वर को अपना प्रियतम बना लेना यह ह्दय की उच्चतम एकाग्रता और भाव विह्वलता है जो योग का ही एक स्वरुप है,
विश्व की मूल प्रवृत्ति से अलग होकर भक्ति को माधूर्य के साथ निभाना,प्रीत के स्वरुप मे प्रस्तुत करना , भाव विह्वलता की उच्च अवस्था को प्राप्त करना,यही योगसूत्र है,
योग का अर्थ केवल शरीर को विभिन्न कठिन स्वरुपोँ मे आसित करना यही नही है, शरीर के आसन मन को साधने के लिये आवश्यक है पर मीरा का भक्ति योग इन सबसे अलग है,मन सधा हुआ है और मन केवल कृष्ण के लिये अर्थात भक्ति की परम अवस्था से जुडा हुआ है,
“भाया मोहन का रुप, जोडा रिश्ता अनूप कोई दूजा स्वरुप मीरा माने ना”
मीरा की आध्यात्मिक यात्रा
यह तीन सोपानों से गुजरती है,
प्रथम सोपान, प्रारंभ में उसका कृष्ण के लिए लालायित रहने का है।इस अवस्था में वह व्यग्रता से गाती हैं।
“मैं विरहणि बैठी जांगू, जग सोवेरी आलि “और कृष्ण मिलन की तड़प से बोल उठती हैं
”दरस बिन दुखण लागे नैन”
द्वितीय सोपान यह है कि जब कृष्ण भक्ति से उपलब्धियों की प्राप्ति हो जाती है और वह
कहती है,
“पायो जी, मैंने राम रतन धन पायो
मीरा के ये उद्गार उनकी प्रसन्नता के सूचक हैं और इसी तरंग में वह कह
उठती है “साजन म्हारे घरि आया हो, जुगा जुगारी जीवता, विरहणि पिय पाया हो
तृतीय एवं अंतिम सोपान वह है, जब उन्हें आत्म बोध हो जाता है जो सायुज्य भक्ति की चरम सीढ़ी हैं। वह अपनी भक्ति में सखय भाव से ओत-प्रोत होकर कहती हैं
“म्हारे तो गिरधर गोपाल, दूजो न कोई
मीरा अपने प्रियतम कृष्ण से मिलकर उसके साथ एकाकार हो जाती है।
“इक जोगन राजस्थानी,,मीरा,,,गिरधर की प्रेम दीवानी मीरा”
गोकुल की भोर,,बरसाने की दोपहरी वृँदावन की शाम देख लेती थी,,
कौनसा काजन मीरा नैन मे लगाती थी,,जो नैन मूँदकर भी घनश्याम देख लेती थी,

मीरा भाई के भक्ति योग को समझने के लिए योगसूत्र समझने की आवश्यकता है ,योग का अभ्यास करने वाला बहुत साहसी होता है क्योँकि वह अपने हृदय की विभिन्न अवस्थाओँ से परिचित होता है,वह स्वयँ से परिचित होता है,
“जग रुसे तो म्हारो कोईँ करसी”
मीरा बाई के भक्ति योग मे एसे कई प्रसँग आते है जहां विश्व और समकालीन समाज के अनेकानेक बँधनोँ को तोडकर उनको अपने भक्ति योग को साधना होता है, राजपुताना की मेडता के समाज बँधनोँ को तोडकर भक्ति और भावविह्वलता की परम अवस्थआ को प्राप्त करना
मीरा बाई के भक्ति योग से समाज को प्रेरणा लेनी चाहिये ,हृदय को साधना और साधते हुए परम अवस्था को प्राप्त करना , स्वयँ को जानने की एक लँबी प्रकिया मे धैर्य बनाकर रखना, धीरता और विह्वलता के सम्यक भाव को समझना ही भक्ति योग है

(लेख को समृद्ध बनाने के लिये समुत्कर्ष पत्रिका द्वारा प्रदत्त सामग्री के लिये सँपादक श्री हरिद्त्त जी का आभार)

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