माँ सीखा सकती है बच्चोँ को योग

बच्चोँ को योग सीखाने मे माँ की भुमिका

लेखिका -सँपूर्णा जोशी
योग भारतीय सँस्कृति का अभिन्न अँग है,वैदिक युग से ही योग हमारी जीवन शैली का हिस्सा रहा,समय के साथ आक्रमणोँ के कारण भारतीय सँस्कृति का ह्रास हुआ .दुष्प्रभाव हमारी जीवन शैली पर पडा और हम इससे दूर होते चले गये
अब तीव्र आवश्यकता महसूस की जा रही है कि भागती दौडता जिंदगी मे योग को पुन: स्थान मिले,जो अस्वास्थ्यकर आदतेँ हमने अपना ली है उनसे छुटकारा मिले,और उनसे छुटकारा पाने का योग ही सबसे बढिया उपाय है, योग केवल बडो के लिये ही नही बाल्यावस्था के लिये भी अति आवश्यक है औऱ इस उम्र मे योग सीखाकर उसको जीवन पर्यँत आदत बनाया जा सकता है,साथ ही साथ बालक के शारीरिक और मानसिक विकास मे सकारात्मक सहयोग करता है,
यूँ तो बालक जन्म के साथ ही बहुत सारी चीजेँ बडोँ को देखकर, सुनकर और स्वयँ उसी के अनुसार करके सीखता है,परँतु योग एसी क्रिया है जिसे प्रशिक्षित गुरु से ही सीखना पडता है,गलत अभ्यास से गलत प्रभाव पडता है,जब गुरु की बात चली है तो सर्व विदीत है कि बालक की प्रथम गुरु उसकी माँ है,.जब तक बालक अपने सभी कार्य स्वयँ नही कर लेता तब तक वह अधिकतम माँ पर ही निर्भर करता है और उसका अधिकतम समय माँ के साथ ही बीतता है,
आज बहुत सारी स्थितियाँ बदल चुकी है,और स्वयँ माँ को भी घर के अलावा कई जिम्मेदारियां है
आज बालक और माँ दोनोँ की दिनचर्या काफी व्यस्त है,बालक सुबह स्कूल जाता है, फिर होमवर्क और ट्युशन मे बहुत व्यस्त हो जाता है,माँ भी नौकर और घर के कामोँ मेँ व्यस्त रहती है,
बालक के लिये टीफीन तैयार करना और स्कूल छोडने के अलावा भी माँ को कई कार्य होते है,इस प्रकार माँ और बालक दोनो व्यस्त रहते है,आज का जीवन बाल्यकाल से ही व्यस्ततम हो जाता है, तनाव पालने लगता है,पढाई की दौड मे भी रहना है और बालक को स्वस्थ भी बनाये रखना है,इस तनावपूर्ण स्थिति मे योग बहतु सहयोग करता है,. चुँकि सँतान माँ के अधिक निकट होती है अत: यह माँ का उत्तरदायित्व है कि बालक को योग सीखाया जाये

माँ बालक को खाना पीना,बोलना चलना ,उठना बैठना सीखाती है ,उन्हीँ क्रियाओं मेँ वह अनजाने मे योग भी सीखा देती है,जैसे भोजन के लिये पालथी लगाकर बैठना,मतलब सुखासन मेँ बैठना.
माँ ही बालक को योग सीखा सकती है और योग को बालक के जीवन का हिस्सा बन सकती है,जैसे प्रात: काल उठकर सबसे पहले धरती माँ को प्रणाम करना,बडोँ को पूरा झुककर दोनो हाथोँ से चरण स्पर्श करना,इस प्रणान करने की प्रक्रिया मे बालक जब झुकता है तो पादहस्तासन स्वाभाविक रुप से हो जाता है,इस आदत के साथ बालक मे सँस्कार भी पडेँगे और बालक को आशीर्वाद भी मिलेगा,,साध ही घर का वातावरण भी सुखद होगा,उसके बाद प्रात: काल की सारी क्रियाओँ को करने के बाद पूजन करने के लिये बिठाना,सभी पँथोँ मे पूजा लय के साथ की जाती है ,इसी तरह बालक का स्वर, ताल और लय के साथ श्वाँस प्रश्वाँस की प्रक्रिया पर नियँत्रण हो जाता है,पूजन करते समय बैठना ही वज्रासन है,भोजन के बाद वज्रासन मे बैठने की आदत डालने से आयु भर के लिये पेट की बीमारियोँ से छुचकारा मिल जाता है,
आज स्मार्टफोन के युग मेँ बालक खेल कूद से दूर हो जाता है,खेल कूद स्वस्थ रहने के लिये आवश्यक है, माँ का दायित्व है कि बालक को बाहर जाकर खेल खेलने के लिये प्रेरित करे,निरँतर प्रयास से सफलता जरुर मिलती है और बालक का ध्यान मोबाइल से हट जायेगा,इस हेतु माँ का प्रयास और आग्रह बहुत आवश्यक है ,
माताओँ को यह जानना आवश्यक है कि छोटी उम्र मे योग सीखने से बालकोँ को आने वाले समय मे उन्हेँ कई रोगो से दूर रखा जा सकता है,इस हेतु योग शारीरिक गतिविधियोँ की दिनचर्याँ मे कमी को पूरा करेगा,योग का अभ्यास करने वाले बच्चे जब किशोरावस्था मे प्रवेश करते है तो अपने जीवन मे आने वाले बदलाव को और तनाव को अच्छे से हेँडल कर पाते है,और उन्हेँ अपने जीवन मे अच्छा प्रदर्शन करने की ऊर्जा योगाभ्यास से मिलती है,
माँ और बालक का जो भावनात्मक सँबँध होता हैवह बालक को सकारात्मक ऊर्जा देता है,माँ बालक को जो प्रेरणा देती है वह बहुत महत्वपूर्ण है,माँ बालक को योग के लिये प्रेरित कर एक बहुत बडा कार्य करती है,कुछ योग जैसे ऊँ का उच्चारण करना, शीतली प्राणायाम करना ,भ्रामरी मेँ भँवरे की तरह आँख बँद करके भँवरे की गुँज करना, एक पादासन करना ,धनुरासम करना,ये क्रियायेँ बच्चोँ के लिये मजेदार भी होँगी और साथ ही माँ का भी स्वयँ का अभ्यास होगा.

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