योगेश्वर भगवान श्री कृष्ण

योगेश्वर भगवान श्री कृष्ण
डाँ आशा मेहता
सेवानिवृत्त व्याख्याता
योग शब्द भुज धातु से बना है,जिसका अर्थ है जोडना,मेल करना.महर्षि पतँजलि के अनुसार “योगश्चित्तवृद्धि निरोध:”ही योग है,उम्होने च्तेत वृद्धि के निरोध हेतु अष्टांग योग का विस्तार पूर्वक वर्णन किया है,यम,नियम,आसन.प्राणायाम,प्रत्याहार ,धारणा,ध्यान समाधि, इनको अपनाकर व्यक्ति अपनी आत्मा का परमात्मा से योग करवा सकता है,
गीता मे पातँजल य़ोग के अनुसार,अष्टाँग योग का वर्णन नही है लेकिन ध्यानायोग का वर्णन अवश्य है,गता के योग का अर्थ पातँजल योग से अधिक व्यापक है,गीता का अर्थ है युक्ति,साधना,कुशलता उपाय आदि.
श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय के अडतालिसवेँ श्लोक मेँ योगेश्वर श्री कृष्ण कहते है
योगस्थ: कुरु कर्माणिसँघँ त्यक्त्वा धनँजय
सिद्धयसिद्धयो: समो भूत्वा समत्वँयोग उच्यते

हे धनँजय,तू आसक्ति को त्याग कर तथआ सिद्धि और असिद्धि मेँ समान बुद्धि वाला होकर योग मे स्थित हुआ कर्तव्य को कर,क्योँकि समत्व ही योग कहलाता है,
जब व्यक्ति के मन मेँ संत्व का भाव आ जाता है, तभी उसके साँसारिक कार्योँ मे कुशलता आ जाती है-
“बुद्धियुक्तोँ जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते
तस्मात योगाय युज्यस्व योग: कर्मसू कौशलम्”

योगेश्वर अर्जुन से कहते है समबुद्धि युक्त पुरुष पुण्य और पाप दोनोँ को इसी लोक मेँ त्याग देता है,अर्थात उनसे मुक्त हो जाता है.इससे तू समत्व रुप योग मे लग जा यह समत्व रुप योग ही कर्मोँ मेँ कुशलता है अर्थात कर्म बँधनोँ से छूटने का अवसर है,
भगवान श्री कृष्ण को योगेश्वर इसीलिये भी कहा जाता है कि उन्होने अर्जुन को गीता जो उपदेश दिया उसके प्रत्येक अध्याय के शीर्षक मेँ योग शब्द जोडा गया है जैसे विचार योद ,सांख्य योग,कर्मयोग,ज्ञानकर्म,सँन्यास योग,विभूतियोग,भक्तियोग,पुरुषोत्तम योग आदि आदि.इसी तरह प्रत्येक अध्याय के अँत मेँ जो अध्याय समाप्ति दर्शक सँकल्प है,उसमेँ भी “ब्रह्मविद्यायाँ योगशास्त्रे” लिखा गया है,इससे यह स्पष्ट होता है कि गीता योगशास्त्र है और इसे कहने वाले योगेश्वर है,
गीता के नवेँ अध्याय मे योगेश्वर का सँकल्प है-
“अनन्याय़श्चिँत्यँतो माँ ये जना: पर्युपासते
तेषाँ नित्याभियुक्तानाँ योगक्षेमँ वहाम्यहम”

जो अनन्य प्रेमा भक्त जन मुझ परमेश्वर को निरँतर चिँतन करते हुए निष्काम भाव से भजते है,उन नित्य निरंतर मेरा चिँतन करने वाले पुरुषोँ का योगक्षेम मै स्वयँ प्राप्त कर लेता हूँ,
यहाँ भगवत्स्वरुप की प्राप्ति का नाम योग है और भगवत्प्राप्ति के निमित्त कियेँ हुए साधन की रक्षा का नाम “क्षेम” है, कहा भी जाता है कि हम ईश्वर की ओर एक कदम बढायेँगे तो ईश्वर हमारी ओर सौ कदम बढायेँगे
गीता के अठारहवेँ अध्याय के अँत मेँ दिव्य दृष्टि युक्त सँजय पाँडवोँ की विजय के सँबँध मेँ धृतराष्ट्र से कहते है
“यत्र योगेश्वर:कृष्णो तत्र पार्थोँ धनुर्धर:
तत्र श्री विर्जयो भूति ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम”

हे राजन जहाँ योगेश्वर श्री कृष्ण है अर्थात भगवान श्री कृष्ण समस्त योगशक्तियोँ के स्वामी है जहाँ गाँडीवधारी अर्जुन है ,वहीँ श्री ,विजय, विभूति और अचल नीति है ,एसा मेरा मत है,
गीता के ज्ञानयोग, कर्मयोग और भक्तियोग की त्रिवेणी मेँ स्नान करने के उपराँत व्यक्ति के जीवन का स्वत: ही रुपाँतरण होने लगता है .बस आवश्यकता इस बात की है,कि गीता के वचनोँ को पूर्ण श्रद्धा के साथ जीवन मे उतारा जाये.
इन तीनोँ योगो के अतिरिक्त योगेश्वर श्री कृष्ण ने आत्मसँयम योग, सँन्याय योग,बुद्धियोग,अभ्यास योग.ध्यानयोग,राजयोग आदि की विशद व्याख्या की है,जिन्हेँ आचरण मेँ अपनाकर व्यक्ति अपने जीवन को सकारात्मक दिशा दे सकता है,
अँत मेँ,इस धरती पर हम अकेले आये है और हमेँ अकेले ही जाना है इसीलिये हमेँ दूसरोँ के व्यवहार के आधार पर व्यवहार नही करना चाहिये,हमेँ योगेश्वर श्री कृष्ण की कृपा से प्राप्त ज्ञान के आधार पर व्यवहार और कर्म करना है,जब हम उनकी शिक्षा को अपना लेते है,तो हमारा व्यवहार और दृष्टिकोण बदल जाता है
शिकवा नही शुकराना करना सीख गये
तेरी सँगल मे खुद को झुकाना सीख गये
हे योगेश्वर,पहले मायूस हो जाते थे,कुछ ना मिलने पर,
अब तेरी रजा मे राजी होना सीख गये

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