योग: अनँत से जुडने की प्रक्रिया

लेखक परिचय:लेखक प्रकाशचँद्र सामाजिक कार्यकर्ता है. उत्तिष्ठ भारत नामक सँगठन के सँस्थापक .उत्तिष्ठ जाग्रत के माधियम से विद्यार्थियोँ,नवयुवकोँ और समाज के बुद्धिजीवि वर्ग के बीच राष्ट्रीय विचारधार के सँप्रेषण का कार्य आप कर रहे है,लेखक राष्ट्रीय स्वयँसेवक सँघ से भी जुडे हुए है,

योग अर्थात अनँतत्व से जुड जाने की प्रक्रिया,परमतत्व मे विहीन होने की,अनहद आनँद की अनुभूति करने का माध्यम,योग अर्थात मानवतँत्र का महाविज्ञान.
योग सँपूर्णत: विज्ञाननिष्ठ प्रक्रिया है,जो हमे उत्तरोत्तर अधिकाधिक उन्नत बनाते हुए,पूर्णत्व की ओर ले जाती है और अप्रत्यक्ष रुप मेँ निर्मित सारी ग्रँथियाँ तोडकर हमेँ वैसा बनाती है जैसा सृष्टिकर्ता ने हमेँ बनाना चाहा था.आधुनिक विज्ञान अब इस बात की पुष्टि कर रहा है कि जीवन का हमारा अनुभव हमारे आँतरिक दृष्टि के स्तर पर निर्भर करता है .
योग दृष्टि की अनुभूति के सँवेदनशीलता के उस स्तर को बढाता है
सामान्यत: हमारा जीवन ,हमारे विचार ,भावनाओँ और मनस्थिति द्वारा दिग्दर्शित होता है,योग हमारे विचारोँ ,भावनाओँ और मनस्थिति को आत्मचेतना द्वारा प्रकाशित करता है,हमारा तँत्र उस स्तर तक जाता है जहाँ हम चित्रोँ को वैसा देख पाने की दृष्टि प्राप्त करते है जैस वह है,योग हमेँ जीवन की यथार्थता के दर्शन करवाता है,आत्मोन्नति के साथ ही योग हमारे जीवन को समृद्ध एवँ सुँदर बनाता है,जैसा कि मेने कहा था,योग हमेँ वह बनाता है जैसा हमेँ होना चाहिये अत: य़ोग द्वारा हमारे विचार,भावनायेँ सुव्यवस्थित,सुगठित होती है,हमारी क्षमतायेँ बढती है,बुद्धिमत्ता , समझने की शक्ति और गुढ दृष्टि बढती है, जो हमारे प्रत्येक कार्य मेँ अभिव्यक्त होती है,
जीने से सामान्यत: दो प्रकार है,एक है योगीत्व और दूसरा है रोगीत्व,
जैसे एक रोगी होता है किसी रोग से ग्रसित, उद्वेलित,खिन्न,आवेगी,नियँत्रणहीन,उसका जीवन उसका निर्णय नही होता,किसी वस्तु के प्रभाव से प्रवेगित होता है,
एक होता है योगीत्व,जीवात्मा जो अपनी प्रज्ञा मे स्थित होता है,उसे कोई वस्तु विक्षिप्त या विचलित कर पाने मे असमर्थ होती है ,उसका आनँद किसी बाह्य. वस्तु पर निर्भर नही होता है,वो स्वयँ अक्षय सुख का स्त्रोत बन जाता है,जैसे कि गीता मे कहा गया है,अपने आत्म स्वरुप मे तृप्त रहता है,
यह योग है क्या? और यह कार्य कैसे करता है? सँभवत: हम आसनोँ को ही योग समझते है,वास्तव मे आसन योग का एक अँग है,यो यूँ कहे योग साधने के लिये आवश्यक पूर्व तैयारी है,एसा नही है कि हमेँ योग चैतन्याभूति करवाता है ,वास्तव मेँ हम चैतन्य है ही,पर हम उसकी अनुभूति नही कर पाते है,बात बस इतनी तो है,अनुभूति क्यो नही कर पाते है? क्योकि वहाँ आवरण है अनेक, योग उन्हेँ क्रमिक रुप से दूर करने की प्रक्रिया है,.जब ये सारे आवरण हट जायेँगे,आत्मरुप के अनँतत्व का साक्षात्कार अपने आप हो जाता है,
पतँजलि ने इस हेतु योग को आठ अंगो मे विभाजित किया है.उस अनुभूति के लिये कुछ तैयारी करनी होगी,
• यम नियम,जिसमेँ मन चित्त शरीरशुद्ध हो जाता है,
• आसन जिसमेँ शरीर की ज्यामिति अनँत की ज्यामितीय सँरचना मेँ सँलग्न हो एकरुप हो,फिर प्राणायाम की ऊर्जा द्वारा शरीर पर महारथ प्राप्त करना ,
• बिखरे हुए चित्त को अभ्यास द्वारा सुव्यवस्थित शाँत करना,जिसे प्रत्याहार कहते है,जिसमेँ बहिर्मुखी मन अँतर की ओर झाँकनेँ मे समर्थ होता है,
• उसके पश्चात मन को एकाग्र धारण करना होता है, धारणा सधने पर अपने आप ध्यान लगता है,और ध्यान गहरा होने पर समाधि सधती है और अँत मेँ अनँतत्व से योग हो जाता है,

इस योगाभ्यास के कुछ सामान्य नियम है
• हम पेट मे कुछ भी ठूँस कर मन को शाँत नही कर सकते है,इसीलिये अल्प एवँ योग्य आहार
• आरँभ मे योगाभ्यास के लिये एकाँत ,अधिक सँपर्क विलाप से योग करना मुश्किल हो जाता है
• मन चित्त शुद्ध बनाये रखना
• माहौल पवित्र शाँत हो,मन को प्रसन्न करने वाला हो
• योग एक प्रक्रिय़ा है अत:पूर्ण होने तक नियमितता
भारत देश एक समय विश्व मे सर्वोच्च स्थान पर विराजित था,व्यापार , ,सँस्कार , ज्ञान , विज्ञान ,शस्त्र , शास्त्र,कला इत्यादि क्षेत्रोँ मेँ भारत ने उत्तमोत्तम सर्जन किया .उसका रहस्य योग मे है, भारत योगियोँ का देश था. उस समय मे मन और मस्तिष्क का जो स्तर रहा होगा वही भारत के सर्जन मे अभिव्यक्त हुआ होगा,सृजन सदैव सृजक के स्तर का होता है,भारत ने अपना स्तर योग सँस्कृति के द्वारा ऊँचा किया था.
परचक्र के कालखँड मे हम योग से विमुख हुए,योग जिसससे हमेँ असीम सामर्थ्य प्राप्त हो रहा था फससे हम कट गये,हमारा स्तर नीचे आने लगा,राष्ट्र की सृजन क्षमा का हास होने लगा,
किसी महान देश और महान सँस्कृति के निर्माण का मार्ग है,महान व्यक्तित्वोँ का निर्माण,योग महान व्यक्तित्वोँ के निर्माण का विज्ञान है,वह विश्व विजय के स्वप्न को साध्य करने का साधन है.

प्रकाशचँद्र
सूरत

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