योग और हम

योग व हम
लेखिका-डाँ दीपिका राव
आधुनिक समय मे योग शब्द बहुत प्रचलित है,यह एक लोकप्रिय सँप्रत्यय है,यह साधना विशुद्ध रुप से भारतीय मूल की रही है ,वर्तमान समय मे प्रचलित अनेक ध्यान पद्धतियोँ की जननी भी योग सादना रही है योग की अवधारणा हमेँ यह बतलाती है कि मनुष्य की शारीरिक और मानसिक अवस्थाओँ की कितनी उत्कृष्ट समझ भारतीय मानसियोँ को थी.योग को निम्न चरणोँ मे विभाजित किया जा सकता है,
1)योगसूत्र
योगसूत्रोँ की रचना 400 ई. पहले पतँजलि ने की थी.उनके अनुसार चित्त की मनेवृत्तियोँ को चँचल होने से रोकना (चित्तवृत्तिनिरोध) ही योग है,अर्थात मन को इधर उधर भटकने से रोकना.योगसूत्र योगदर्शन का मूल ग्रेँथ है यह योगशास्त्र का एक ग्रँथ है.पतँजलि ने आत्मा और जगत के सँदर्भ में सारत्य दर्शन के सिद्धाँतो का ही समर्थन और प्रतिपादन किया है,पतँजलि ने सारे दुखोँ और कष्टोँ से बचने का साधन योग बताया है और कहा कि क्रमश: य़ोग के रँगो का सोधने से मनुष्य सिद्ध हो जाता है और अँत मे मोक्ष प्राप्त कर लेता है .पतँजलि के सूत्रोँ पर सबसे प्राचीन मान्य वेरत्यास जी का है,उस पर वास्पति मिश्र का वार्तिक भी है .योगसूत्रोँ पर योगराज की भी एक वृत्ति है (मोक्षवृत्ति) सृष्टितत्व आदि के सँदर्भ में योग का भी प्राय: वही मत है जो साँरत्य का है .इससे साँरत्य को ज्ञानयोग और योग को कर्मयोग कहते है
2)योग का भारतीय इतिहास
योग शब्द सँस्कृत की भुज धातु से बना है जिसका अर्थ जुडना व एकजुट होना होता है.आधुनिक वैज्ञानिकोँ के अनुसार ब्रह्माँड की हर चीज उसी परिमाणवक्ष की अभिव्यक्ति है .जो भी अस्तित्व की इस एकता को महसूस कर सकता है ,उसे योग मे स्थित कहा जाता है और उसे योगी कहकर पुकारा जा सकता है. जिसने मुक्त अवस्था प्राप्त कर ली है
योग के विज्ञान की उत्पत्ति सभ्यता की उत्पत्ति के साथ हुई है और सबसे पहला योगी शिव को माना जाता है,सप्तऋषियोँ ने इस योग विज्ञान को मध्य पूर्व एशिया,उत्तरी अफ्रीका और दक्षिणी अफ्रिका के कई भागों मे पहुँचाया.योग करते पित्रोँ के साथ सिँधु सरस्वती घाटी सभ्यता के अनेक जीवाश्म अवशेष एवँ मुहरेँ प्राप्त हुई जो भारत मे योग की उपस्थिति का प्रमाण है,
वादिक काल मे सूर्य को अधिक महत्व दिये जाने के कारण सूर्य नमस्कार प्रथा प्रचलन मेँ आयी,प्राणायाम दैनिक दिनचर्या का हिस्सा था.पतँजलि के बाद अनेक ऋषियोँ और योगाचार्योँ ने अच्छी तरह प्रलेखित अपनी प्रथाओँ और साहित्य के माध्यम से योग के सँरक्षण और विकास मेँ काफी योगदान दिया.500 ईसा पूर्व-800 ईस्वी सन् के बीत की इतिहास एवँ विकास मेँ सबसे ऊर्वर और महत्वपूर्ण अवधि मे रखा जाता है .पतँजलि के योगसूत्र मे न केवल योग के विभिन्न पहलु है बल्कि मुख्य रूप से इसकी पहचान 8 रुपोँ मे होती है.पूर्व वैदिक काल (2700 ई पूर्व) मेँ और इसके बाद पतँजलि काल तक योग की मौजुदगी के एतिहासिक साक्ष्य प्राप्त हुए हैँ,
3)योग के प्रकार
इस योग के आठ अँग है,जिसके कारण पतँजलि ने इसका नाम अष्टाँग रखा था,इसका महत्वपूर्ण अँग है ध्यान.आठ अँग यम नियम आसन प्राणायाम प्रत्याहार धारण ध्यान और समाधि है.आसन राज योग का महत्वपूर्ण अँग है,
1)कर्मयोग इसका सिद्धाँत है जो हम आज अनुभव करते है वो हमारे कार्योँ द्वारा ही अतीत मे बनाया गया है .कर्म आत्म आरोही का मार्ग है,जब भी हम अपना काम करते है और अपना जीवन निस्वार्थ रुप मे जीते है ,दूसरोँ की सेवा करते है,इसे कर्मयोग कहते है
2)भक्तियोग-सृष्टि मे परमात्मा को देखकर,भक्ति योग भावनाओँ को नियँत्रित करने का एक सकारात्मक तरीका है ,भक्ति के मार्ग से स्वीकार्यता व सहिष्णुता प्राप्त होती है
3)ज्ञानयोग-यह ऋषियोँ और विद्वानोँ का मार्ग है ,यह बुद्धि का योग है,इसके पथ पर लने के लिये योग के ग्रँथोँ और ग्रँथोँ के अध्य़यन के माध्यम से बुद्धि के विकास की आवश्यकता होती है,

वर्तमान समय मे योग के प्रकारोँ को आसन व प्राणायाम के प्रकारों के रुप मेँ भी देखा जाता है ,परँतु जितने भी प्रकार के आसन है चाहे मर्कटासन,भुजँगासन,धनुआसन, कपालभारती प्राणायाम, अनुलोम विलोम हो भस्त्रिका प्राणायाम,सभी योग के अँतर्गत ही आते है,

4)भारत के योग गुरु
वैसे तो विशअव भर मे स्वामी रामदेव जी को योग गुरु के रुप मे प्रसिद्धि मिली है,जिन्होने पूरे विश्व भर मे योग को एक महत्वपूर्ण स्थान दिलाया,उनके अथक प्रयासोँ से विश्व भर मे 21 जून को योग दिवस के रुप मे मान्यता मिली.परँतु पूर्व मे एसे बहुत सारे योग गुरु हुए है जिन्होने योग परँपरा को समृद्ध बनाया
तुरुमलाई कृष्णमाचार्य को आधुनिक युग का “पितामह” कहा जाता है.मैसूर के महाराजा के राज मेँ इन्होने योग को बढावा देने के लिये पूरे भारत भर मे भ्रमण किया
बैतलूर कृष्णाचारी सुँदरराज अयँगार ने अयँगार योग को पूरी दुनिया मेँ पहचान दिलाई थी,कई अनुसँधानोँ के बाद उन्होने योग के कई तरीकोँ का आविष्कार किया.स्वामी शिवानँद ने निया को त्रिमूर्ति योग से परिचय करवा. जिसमेँ हठ योग ,कर्म योग और मास्टर योग शामिल है,
आर्ट ओफ लिविँग के सँस्थापक श्री श्री रविशँकर सुदर्शन क्रिया के माध्यम से योग का परिचय करवाते है जिसमेँ श्वाँस पर नियँत्रण का अभ्यास किया जाता है

5)पाश्चात्य लोगो की योग के बारे मेँ भ्राँतियाँ
आज दुनिया भर मे योग के नाम पर काफी कुछ हो रहा है जिसका योग से कोई लेना देना नही है.एसी भ्राँति है कि सिक्स पैक बनाने के लिये योग करना है और शरीर को किसी भी प्रकार से तोड मरोड लेने पर योग हो जाता है,लोग योग को हिँदूत्व से भी जोडकर इसे एक उपासना पद्धति से जोडना चाहते है जबकि योग एक तकनीक है और यह विश्व के कल्याण का एक मार्ग है.योग का अभ्यास सँगीत के साथ करना भी एक गलत पद्धति है,योग का विस्तार भी पिछली सदियोँ मे हुआ है यह भी एक भ्रम है,

जीवन का कोई एसा पहलु नही है जो योगिक क्रिया से परे है,अगर जीवन योग बन जाये तो बहुत कुछ सँभव है
Dr दीपिका राव

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