योग- सनातन संस्कृति का प्राण तत्व

लेखक-स्नेहल आचार्य
भारतीय संस्कृति के आधारभूत तत्वो मे से प्रमुख तत्व है- योग । आध्यात्मिक भारत की अद्वितीय और अनुपम विरासत है- योग। भारत की आध्यात्मिक अनंतता गहराइयों की थाह पाने का सर्वोत्कृष्ट मार्ग है- योग । भारत का धर्म विधान योग शास्त्र पर आधारित है। सनातन धर्म की व्यवस्था का प्राण तत्व है -योग ।
योग और भारत का सम्बंध उतना ही प्राचीन है जितना को भारत और वेद का सम्बंध । वेद की कई ऋचाए और मंत्र योग का गुणगान करते हुए सुनाई पडते है।भारत के ईश्वरीय अवतारो ने समय समय पर योग के महत्ता को सिद्ध करते हुए लोक जागरण का कार्य किया ।भगवान शिव, श्री राम, श्री कृष्ण, महर्षि पतंजलि,स्वामी विवेकानंद, महर्षि अरविंद जैसे अनेक योगियों ने इस प्राण तत्व की प्रतिष्ठा मे अपना सम्पुर्ण जीवन लगाया ।
‘योग’ शब्द के व्याकरण और शब्द की व्युत्पत्ति पर ध्यान दे तो युज ‘ समाधौ ‘ आत्मानेपदी दीवादीगणीय धातु मे ‘घं’ प्रत्यय लगने से योग शब्द की व्युत्पत्ति होती है।योग शब्द के अर्थ मे उतरे तो ध्यान मे आता है कि जुडाव या जोड़ को ही योग कहते हैं । अर्थात आत्मा का परमात्मा से जुडाव ही योग कहा जा सकता है । उस सर्वशक्तिमान परमात्मा जो कि जड़ चेतन की उर्जा का स्त्रोत है उसकी अनंत उर्जा से सम्बंध स्थापित करना ही योग है ।महर्षि पतंजलि के ‘ योग सूत्र’ के अनुसार “योगश्चित्तवृत्त निरोध: ” अर्थात चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग कहलाता है।सामान्य शब्दों मे शरीर, बुद्धि, मन और आत्मा की शुद्धि की प्रक्रिया का नाम योग है ।
वर्तमान कालखंड मे योग केवल शारिरीक श्रम का नाम दिखायी देता है , किन्तु जिस प्रकार समुद्र गहराई मे उतरने पर ही अमुल्य रत्नो की प्राप्ति होती है ठीक उसी प्रकार योग की गहराइयों मे उतरने पर ही इसकी अमुल्य निधि प्राप्त होती है । मन, बुद्धि और आत्मा के स्तर तक का शुद्धीकरण होने पर ही केवल्य की प्राप्ति होती है । वर्तमान मे जो शारिरीक श्रम दिखायी देता है वो केवल योग का एकदम आरम्भिक अभ्यास है।
योग का लक्ष्य
योग को मूलत: तीन स्तरों मे विभजित किया जा सकता है-:
प्रथम चरण: शारिरीक शुद्धता
द्वितीय चरण: मन और बुद्धि की शुद्धता
तृतीय चरण: आत्मा की शुद्धता
शरीर का मन से, मन को बुद्धि से, बुद्धि को भाव से और भाव को अन्तस से योग यही योग का लक्ष्य है।
योग का लक्ष्य आत्मदर्शन या आत्मसाक्षात्कार भी कहा जा सकता है । योग का लक्ष्य मनुष्य मात्र की शारिरीक बौद्धिक और आत्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करना है। मनुष्य को विकसित कर उसे इन्द्रियतीत अनुभव करवा कर उस परम चेतना जो की ब्रम्हाण्ड की चेतना है उससे जुडाव ही योग का परम लक्ष्य है। इसी उद्देश्य को भारत की आध्यात्मिक सत्ता ने ना केवल जिया अपितु इसके सर्वश्रेष्ठ मार्ग खोज कर इसका सरलीकरण कर इसे जीवन्त किया और उसे प्रचारित भी किया ।
योग और वेद
“सा धिनां योगमिंवती” (ऋग्वेद 1/18/7)
ऋग्वेद की यह ऋचा उद्घोष करती है की विद्वानों का कोई भी कर्म बिना योग के पुर्ण नही होता है। इसी घोषणा से हमे ध्यान में आता है की जितना प्राचीन वेद है उतना ही प्राचीन योग भी है ।
“स द्या नो योग आमुपत सा राये स पुरं ध्याम ।
गमद् वाजेभरा स न: ।।” (सामवेद 1/2/311)
सामवेद की यह ऋचा सिद्ध करती है कि बिना योगाभ्यास से साधक ईश्वरीय विवेक या ऋतम्भरा प्रज्ञा की प्राप्ति नही कर सकता । वेदिक काल मे लोग ईश्वर से ऋतन्भरा प्रज्ञा की प्राप्ति हेतू योग सिद्ध होते थे । ऐसा कह सकते है ।

“योगे योगे तवस्तरं वाजे वाजे हवामहे ।सखाय इन्द्र मूर्तयै ।।”
(शुक्ल यजुर्वेद 1/14/3)
शुक्ल यजुर्वेद का यह मन्त्र इन्द्र का आह्नान करता है और कहता है समाधि (योग) हो या समस्या इन्द्र सखा के रुप मे हमारे साथ हमेशा रहते है।
उपरोक्त उदहारणो से कहा जा सकता है कि वेद इस सनातन संस्कृति का ज्ञान है तो योग इस संस्कृति का कर्म है इसका अभ्यास है । दुसरे शब्दो मे कहे तो वेदो के कर्म रुप अभ्यास को ही योग कहते है। अंतत: ये कह सकते है कि वेद और योग एक दुसरे के पूरक है । दोनो ही भारतीय संस्कृति के प्राण तत्व है और यही प्राण तत्व इस संस्कृति को कालजयी और मृत्युन्जय संस्कृति बनाते है ।
योग और महापुरूष
भारत की इस पवित्र भूमि पर समय समय पर ईश्वरीय अवतारों ने अपने कर्मों और सिद्धान्तों से इस पुण्य भूमि को रत्नागर्भा सिद्ध किया है ।
भारतीय महापुरुषों ने संस्कृति के इस प्राण तत्व की ना केवल रक्षा की अपितु इसे समय समय पर नये आयाम देकर इसकी जीवंतता को बनाए रखा । भगवान शिव जो की आदि योगी कहलाते है जिन्होने योग का ज्ञान सर्वप्रथम सप्तऋषियों को दिया और योग का संदेश चहुँ और फेलाया से लेकर महर्षि अरविंद और वर्तमान युग मे योगर्षी स्वामी रामदेव जैसी महान विभूतियों ने राष्ट्र को मार्गदर्शन करते हुए योग के लिये प्रेरित भी किया।
भगवान श्री कृष्ण जो स्वयं योगेश्वर के नाम से प्रसिद्ध है । जिन्होने योग पर पुरे एक शास्त्र की रचना युध्द के मैदान मे कर दी । जो की श्रीमद्भागवतगीता के नाम से जाना जता है। इस ग्रंथ मे योगेश्वर ने अर्जुन के साथ संवाद करते हुए अर्जुन के मन के संशय को दूर करते हुए विशद योग से आरम्भ करके मोक्ष सन्यास योग तक की यात्रा की। यह इस सनातन संस्कृति का साहस और शौर्य है कि योगेश्वर यहां पर अर्जुन के मन के विशाद को भी योग का प्रारम्भिक स्वरूप मानते है । ग्रंथ का आरम्भ ही अर्जुन विशाद योग से होता है।इसिलिए इस ग्रंथ को योग शास्त्र भी कहा जाता है।
योगेश्वर इस ग्रंथ मे सांख्य, भक्ति, कर्म, ज्ञान, मोक्ष योग का वर्णन किया गया है ।
श्रीमद्भगवद्गीता मे योगेश्वर कहते है कि
“योगस्थ कुरु कर्माणि संगत्यक्तवा धनंजय ।
सिद्ध्यसिद्धयौ समो भूत्वा समत्व योग उच्च्यते ।।
अर्थात आसक्ति का त्याग कर सिद्धि असिद्धी मे सम रह कर समत्व बुद्धि कर्म करने को ही योग कहा गया है। अन्य शब्दो मे कर्तव्य बुद्धिसे कर्म करने को ही योग कहते है।
आगे योगेश्वर योग की महिमा का गुणगान करते हुए कहते है कि “तस्माद्योगाय युज्यस्व योग: कर्मसु कौशलं ”
अर्थात बुद्धि और समता से युक्त मनुष्य जीवित अवस्था मे ही पाप और पुण्य का त्याग कर देता है अत: तू योग मे लग जा क्युंकि योग से ही कर्मों मे कुशलता आती है ।
आगे इसी ग्रंथ मे भगवान योगेश्वर सन्यास और निष्काम कर्म योग की तुलना करते हुए निष्काम कर्म को श्रेष्ठ बताते है। भगवान योगेश्वर कहते है की मनुष्य अपनी बुद्धि, क्षमता और प्रेरणा के अनुसार इच्छित योग मार्ग अपना कर सत् चित् आनन्द की प्राप्ति कर सकता है । योगेश्वर कहते है कि श्रेष्ठ जीवन जीने और मोक्ष के अभिलाषी का योग के मार्ग पर चलना अनिवार्य है ।अंतत: श्रीमद्भगवद्गीता और योगेश्वर भगवान श्री कृष्ण दोनो ही जीवन को योगमय बनाने की प्रेरणा देते है ।
वर्तमान मे जो स्वरुप योग का हमे दिखायी देता है उसके जनक महर्षि पतंजली है । पतंजली ने योगसूत्र की रचना की। योगसूत्र द्वारा प्रदत्त परिभाषा ही योग की सर्वाधिक मान्य परिभाषा है । योग सूत्र मे कुल 195 सूत्र है जिन्हे
महर्षि पतंजलि ने चार भाग मे वर्गीकृत किया है-:
1 . समाधि पाद (51 सूत्र) जो कि चेतना के जागरण के सूत्र उजागर करता है ।
2 . साधन पाद (55 सूत्र) ये सूत्र अभ्यास के निर्देशो को धरण कर योगी का पथ प्रदर्शन करते है ।
3 . विभूति पाद (55 सूत्र) ये सूत्र अभ्यास की प्रगति साधना का स्तर और उसके अभ्यासों का निर्देशन करते है।
4. केवल्य पाद (34 सूत्र) ये चतुर्थ और अन्तिम पाद मुक्ति से सम्बंधित सूत्र से युक्त है ।
यह शास्त्र केवल शारिरीक मुद्राओं पर आधारित नही है यह शास्त्र किसी देव या पूजा पद्धति आधारित नही है । यह शास्त्र आत्मा और परमात्मा से एकाकार होने के मार्गो की खोज करवाता है ।
पतंजलि योग सूत्र का मुख्य अंग है अष्टांग योग जिसके आठ अंग है-:
1 यम, 2 नियम, 3 आसन, 4 प्राणायाम, 5 प्रत्याहार, 6 धारणा, 7 ध्यान, 8 समाधि ।
इन्ही अष्टांग पर आधारित योग वर्तमान समय मे अधिक प्रचलित है। पतंजलि ने भारतीय योग दर्शन को योग सूत्र की अनुपम और अप्रतिम भेंट प्रदान की जिसने भारतीय योग दर्शन को नये आयाम स्थापित करने मे अपना अभूतपूर्व योगदान दिया ।
भारतीय संस्कृति के उद्घोषक तथा सनातन धर्म के विश्व मानव स्वामी विवेकानंद ने पाश्चात्य देशो मे योग का प्रचार प्रसार किया है । विवेकानंद कहते है ” वेदो में और शास्त्रो मे जो अनुभूति है जो आत्म साक्षात्कार और आत्म दर्शन है तो वो इसी जन्म मे और यही पर होना चाहिये । ”
आगे स्वामी जी ने कहा योग वह विज्ञान है जो हमारे चित्त की इन परिवर्तनो के उलझनो मे उलझाने से बचाता है। स्वामी जी ने ज्ञान योग, भक्ति योग, कर्म योग और राज योग पर विदेशो मे और भारत मे कई प्रवचन और व्याख्यान दिये ।
स्वामी जी का कहना था की विश्व की सारी समस्या का समाधान केवल और केवल योग युक्त जीवन से ही हो सकता है । समाज के द्वारा योगमय जीवन अपनाने से ही सारी समस्याओं का समाधान हो सकता है ।
योग पर चर्चा हो और महायोगी महर्षि अरविंद की चर्चा ना करना बेमानी होगी । क्रांतिकारी अरविंद घोष से महायोगी अरविंद बनने की यात्रा बडी रोचक और रोमांचक है ।वास्तव मे तो ये यात्रा ही योग की है ।
श्री अरविंद कहते है कि “वे अतिमन मे एकतम मे लौट जाते है । और वहा एकतम पुरुषोत्तम के बहुव्यक्तित्व के साथ युक्त रहते है ।” उपरोक्त उक्ति महर्षि अरविंद की चेतना का स्तर, योगाभ्यास और साधना का ही परिणाम है ।
महर्षि अरविंद ने अपनी योग साधना के बल पर ही ईश्वरीय चेतना को अपने मे उतार कर उससे नव सृजन के कार्य करवाये जो आज भी उनके किये हुए कार्यों, लेखों तथा साहित्य मे परिलक्षित होते है । महर्षि अरविंद के योग साधना की ही फलश्रुति थी कि उन्होने जन जन के मानस को छुआ । सबके प्रति समभाव, आत्मीयता, राष्ट्रीयता हिन्दुत्व का विशाल दर्शन उनकी स्वाभविक प्रक्रिया थी । वास्तव मे तो क्रान्तिकारी अरविंद घोष से महायोगी अरविंद बनने की यात्रा का श्रेय केवल और केवल योग दरशन को ही जाता है ।
भारतीय महापुरुषो की सूची काफी लम्बी है सबका वर्णन करना यहा सम्भव भी नही है किन्तु सभी के योगदान को नकारा भी नही जा सकता ।ऐसे अनेक महापुरुषो ने ना केवल योग को अपना जीवन बनाया अपितु इसके प्रचार के लिये भी अनवरत प्रयास किये । योग के प्रचार प्रसार मे योगर्षी स्वामी रामदेव के योगदान भी कम नही है । योग के प्रचार के लिये स्वामी जी ने कई राजनीतिक और सामाजिक समस्याओ का सामना करते हुए योग को पुनश्च ख्याति दिलाई तथा आम जन मे यौगिक चेतना को पुन: जागृत किया।
वर्तमान परिदृश्य मे भारत का सौभाग्य है कि यहां की राजनीतिक सत्ता भी भारत की आध्यात्मिक सत्ता की भांति संस्कृति के मान बिन्दुओ के सरंक्षण का कार्य कर रही है । ये उसकी मेहनत का परिणाम है कि आज योग लगभग विश्व 175 से अधिक देशो मे किया जाता है । 21 जून को समूचा विश्व योग दिवस के रुप मे मनाता है । ये योग दिवस आज अन्तर्राष्ट्रीय और वैश्विक पर्व मे बदलता हुआ दिखाई देता है ।
स्वामी विवेकानंद के शब्दों से लेखनी को विराम देता हू।
“अभ्यास से योग आता है ,
योग से ज्ञान की प्राप्ति होती है ज्ञान से प्रेम और प्रेम से परमानंद की प्राप्ति होती है ।”

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