वृक्षारोपण,पौधे को वृक्ष बनायेँ-डा.रागिनी शाह

वृक्षोँ का अपने जीवन मेँ क्या स्थान है,उसके बारे मेँ स्थूल रुप से हम सभी परिचित है,थोडी गहराई मेँ जायेँ तो हम पौधे की यात्रा वृक्ष तक पूर्ण करवा सकते है,केवल पौधे लगा देना ही वृक्षारोपण नही है,पौधा सजीव होता है,पौधा मर न जाये उसकी जिम्मेदारी भी पौधा लगाने वाले की है,वृक्षारोपण कुछ सावधानियोँ के साथ करना चाहिये,आइयेँ समझे कि वृक्षारोपण का सही तरीका क्या है

वृक्षारोपण करने के लिये महत्वपूर्ण जानकारियाँ

भूमि का उपजाऊपन

भूमि उपजाऊ होगी तो पौधे आसानी से पनप सकते है,हमारे रसोईघर का जो कचरा निकलता है,उससे खाद बनाई जानी चाहिये. जैसे सब्जी के छिलके,सडी हुई सब्जियाँ,बासी चपाती,गत्ते,कागज आदि सभी से खाद बनाई जा सकती है,
उसके लिये कोई भी पुराना बर्तन जैसे पेँट की बाल्टी काम मेँ ले सकते है,इसके लिये बाल्टी के तल एवँ दीवारोँ मे 4-5 मिमी के कुछ छेद कर देँ,इसमेँ कुछ पुराना गोबर और केचुएं डाल देँ,केचुएँ किसी भा नर्सरी से प्राप्त किये जा सकते है,रसोईघर का जो कूडा कचरा निकलता जाये वो उसमेँ डालते जायेँ,बाल्टी मे नमी रहनी चाहिये,आवश्यकता पजने पर पानी का छिडकाव किया जा सकता है,इसे कपडे से ढक कर रखेँ,जब एक डिब्बा भर जायेँ तो दूसरे डिब्बेँ मे इसी प्रक्रिया को अपनायेँ,इन डिब्बोँ को छाया मेँ रखेँ,15 दिन से 45 दिन मेँ खाद तैयार हो जायेगी,बनी हुआ खाद काले भूरे रँग की होगी,अबइसी खाद को दुसरी बाल्टी मेँ जिसमेँ थोडा सा गोबर और रसोई का कचरा हो खाली कर देँ,24 घँटे मे सारे केँचुएँ कुडे मे चले जायेँगे,ऊपर बिना केचुएँ की खाद रह जायेगी,अब यह उत्त्म प्रकार की खाद है,इसे् घर मे सब्जी के पौधोँ मेँ ,गमलोँ मेँ काम मेँ लिया जा सकता है,हम पत्तोँ को जला देते है,सब्जियोँ और रसोई का कचरा इधर उधर फेँकते है,,इससे बदबू आती है और सँक्रामक रोग फैलते है,,उपरोक्त विधि से उनका इपयोग करके खाद तैयार करने से भूमि प्रदुषण और वायु प्रदुषण को रोकने के साथ साथ प्राकृतिक तरीके से भूमि की उर्वकता बनाई रखी जा सकती है,

खुली भूमि मेँ जहाँ पत्तोँ की मात्रा अधिक होती है,वहाँ हम पत्तोँ तो जलाने की जगह प्राकृतिक खाद बनाने मेँ उनका उपयोग किया जा सकता है,इसके लिये 10*10*2 फीट या इससे ब़डा आवश्यकतानुसार गड्ढा खोदकर पुराना ठँडा गोबर एवँ पत्ते डाल देँ ,एक कोने मेँ कुछ केँचुए डाल देँ ,अब इसे पत्तोँ से पूरा ढक देँ,पानी का छिडकाव कर देँ.कुछ दिनोँ
मेँ यह खाद मे बदल जाता है,बाजार मे भी सडी हुई सब्जी एवँ फल इधर उधर फेँक दिये जाते है,जिससे बीमारियाँ फेल जाती है,यदि हम इन्हेँ भी एकत्रित करके पत्तोँ की तरह इनसे खाद का निर्माण किया जाता है,जमीन की उर्वरकता बढाने और प्राकृतिक अवशिष्ट पद्राथोँ का उपयोग,ये दृष्टि हमेँ विकसित करनी होगी.

पानी:
पौधो का रोपण करने के बाद कुछ दिनोँ तक थोडा थोडा पानी न देकर सप्ताह मे दो बार 50-100 लीटर तक पर्याप्त मात्रा मे पानी दिया जाये तो ये जल अधिक गहराई तक जाता है,पौधे को सर्दियोँ मेँ 10-15 दिन मेँ 50 लीटर पानी पहले साल मेँ तथा गर्मियोँ मे 7 से 10 दिनोँ मे 50 लीटर तक पानी की आपूर्ति दूसरे साल तक करनी चाहि्ये,पौधे के चारोँ ओर बडा घेरा बनाकर रखना चाहिये ताकि पानी उसके अँदर रह सके,

सूर्य का प्रकाश:
पौधे की वृद्धि के लिये सूर्य का प्रकाश अति आवश्यक है,जहाँ पर्याप्त मात्रा मे प्रकाश आता है,एसे ही स्थानोँ पर पौधारोपण करना चाहिये,गर्मी के मौसम मे पौधो को पर्याप्त पानी देना चाहिये
अगर पर्याप्त पानी देने पर भी पौधे की पत्तियाँ सूख रही हा तो इसके चारोँ ओर ट्री गार्ड लगाकर कपडा लगाकर इस पर आने वाली सूर्य की सीधी किरणोँ से इसका बचाव करना चाहियेु,पौधे की पत्तियोँ पर मिट्टी जमा हो जाने से पत्तियोँ के छिद्र बँद हो जाते है,इसीलिये पौधे की पत्तियोँ पर भी पानी डालना चाहिये,

पौधे का चयन
जहाँ वृक्षारोपण कर रहे है वहाँ की प्राकृतिक वनस्पति के बारे मे भी हमे जानकारी रखनी चाहिये ताकि हम एसे पौधो का रोपण करेँ जो उस भूमि और वातावरण के अनुकूल हो और ठीक तरह से विकसित हो सकेँ,प्रडाति का चयन सावधानी से करना चाहिये और उसके लिये किसी अमुभवी व्यक्ति से सलाह लेनी चाहिये,पौधे लँभी आयु वाले चयन करने चाहिये.उनकी लकडी मजबूत हो और जिसके फल पक्षी खी सकेँ,
उदाहरण: गुलबोहर का पौधा कम आयु वाला और कमजोर लकडी वाला होता ,अशोक बहुत धीरे धीरे बढता है

वृक्षारोपण कैसे करेँ
2*2*2 का गड्ढा करेँ,यदि फलदार पौधा है तो अधिक गहरा गड्ढा करेँ,इसमेँ 5 किलो तक का वर्मी कँपोस्ट अथवा 5 महिवे पुराना गोबर डालेँ. आधे गड्ढे को पुन: भर देँ,खाद एवँ मिट्टी को आपस मेँ अच्छी तरह से मिला देँ,पौधे की थैली को इस तरह काटना चाहिये कि उसकी मिट्टी न बिखरेँ,मिट्टी बिखरने से पौधे की ज़डोँ को नुकसान होता है पौधे की पत्तियाँ गिर जाती है और कभी कभी पौधा भी नष्ट हो जाता है,पौधे की थैली को नीचे से ही काटना चाहिये,इससे मिट्टी के बिखरने की सँभावना कम हो जाती है,साईड मे प्लास्टिक रह जाने से कोई नुकसान नही होता है,
अब पौधे को गड्ढे मे रखकर उसके चारोँ ओऱ मिट्टी डालकर पैरोँ से अच्छी तरह से दबा देँ,अब इसके चारोँ ओर बड़ा गड्ढा बनाकर 50 से 100 लीटर पानी डालेँ
पौधे को लगाने के बाद उसकी सुरक्षा अत्यँत आवश्यक है,बडा मैदान है तो उसके चारोँ ओर ऊँची चारदीवारी होनी चाहिये जिससे मवेशी अँदर न आ सके,पेड के चारोँ ओर सात फीट की ऊँचाई का ट्री गार्ड लगाना चाहिये,पौधए के तारोँ ओर कपडा लगाना चाहिये,बकरी को दि हरी पत्ती दिखती है तो वो इसको अवश्य नुकसान पहुँचायेगी,मवेशी खुजली मिटाने के लिये ट्री गार्ड से अपने शरीर को रगडते है,जिससे ट्री गार्ड को नुकसान पहुँचता है,इसके लिये इसके चारोँ ओर काँटे लगाने की आवश्यकता होती है,जब तक पौधे की छाल मजबूत न हो जाये उसके चारोँ ओर सुरक्षा का प्रबँध करना आवश्यक है,यदि छाल को चूडी के रुप मे चारोँ ओर से नुकसान पहुँचता है तो पौधा सूख जाता है,पौधे की लँबाई 4-6 फीट की हो तो ये सर्वोत्त्म है,ज्यादा बडे पौधे जमीन मे सेट नही होते है और महँगे भी होते है,उनको लाने ले जानेँ मेँ भी दिक्कत होती है
यदि हम पानी बराबर देते है तो दीमक लगने से मुकसान कम होता है,इसके लिये कीटनाशक की आवश्चकता नही होती है,वैसे तो वृक्षारोपण किसी भी मौसम मे किया जा सकता है परँतु वर्षा ऋतु एवँ फरवरी माह सबसे अधिक उपयुक्त है,हम सभी को सँकल्प लेना चाहिये कि धरती के वातावरण को सुरक्षित रखने के लिये अधिक से अधिक वृक्षारोपण करना चाहिये

हमारे चारोँ ओर सजीव और निर्जीव तत्व मिलकर पर्यावरण बनाते है,निर्जीव तत्व पानी ,मिट्टी एवँ हवा तथा सजीव मेँ सूक्ष्म जीवाणु ,वनस्पति से लेकर मनुष्य तक शामिल है,उपरोक्त सभी अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिये एक दूसरे पर आश्रित है.एक वस्तु का सँतुलन बिगडने पर दूसरी भई असँतुलित हो जाती है,मनुष्य हस्तक्षेप न करेँ तो प्रकृति अपने आप सँतुलन बनाये रखती है,परँतु मनुष्य का हस्तक्षेप इस सँतुलन को प्रभावित करता है,आज पर्यावरण जीवन के लिये अनुकूल नही रह गया है,मनुष्य ने विलासिता और स्वार्थ के लिये पर्यावरण के सँतुलन को बिगाड दिया है,

अँधाधूँध और बिना सोचे समझे की जा रही वनोँ की कटाई ने वन्य क्षेत्र को बहुत सीमित कर दिया है,आक्सीजन जिसका न्यूनतम प्रतिशत 21 होना चाहिये , उसकी भी मात्रा कम होती जा रही है,हमेँ सामूहिक रुप से पर्यावरण को बचाने आगे आना होगा अन्यथा हमारा अस्तित्व ही खतरे मेँ पड जायेगा,

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