शादी: एक आदर्श रिश्ते की नींव

लेखिका:  प्रत्याशा नितिन कर्नाटक प्रांत के मैसूर नगर की निवासी हैं | वे एक लेखिका एवं चित्रकार हैं | वे धर्म सम्बन्धी कहानियां और लेख लिखना पसंद करती हैं | उनका उद्देश्य ऐसी कहानियां लिखने का है जो लोगों को अपनी जड़ों से वापस जोड़ सकें एवं उनके मन में भक्ति भाव जागृत कर सकें | उनकी हिंदी एवं अंग्रेजी में लिखी कहानियां प्रज्ञाता नामक ऑनलाइन पत्रिका में प्रकाशित हुई हैं

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सन्तुष्टो भार्यया भर्ता भर्त्रा भार्या तथैव च |
यस्मिन् नेव कुले नित्यं कल्याणं तत्र वै ध्रुवम् ||
जिस घर में पत्नी से पति सदा संतुष्ट रहता है और पति से पत्नी भी सदा संतुष्ट रहती है उसी घर में निश्चित रूप से सदाकाल कल्याण होता है | (मनुस्मृति ३-६०)

शादी, ना जाने कब नए जीवन को आधार देने वाला यह रिश्ता, अपनी प्रतिष्ठा का दिखावा करने का एक माध्यम भर बन गया | देखते ही देखते इसे एक प्रेम सम्बन्ध के परिचायक से पितृसत्तात्मक समाज के थोपे एक बंधन की परिभाषा मिल गयी | और हमेशा की तरह हमारे सनातन धर्म पर इसका भी दोष थोप दिया गया | दहेज़ प्रथा का नाम लेकर हिन्दू रीति की शादियों पर बार बार प्रहार किया गया | ऐसे जैसे कि हर हिन्दू परिवार अपने लड़कों को उस दिन के लिए ही बड़ा करता है जिस दिन उसकी शादी होगी और वो दहेज़ घर लेकर आएगा | कन्यादान संस्कार पर सवाल उठाये गए कि क्या कन्या एक सामान है जिसे दान किया जा सकता है ? मंगलसूत्र की तुलना फांसी के फंदे से कर दी गयी और पैरों की पायल को बेड़ियाँ बता दिया गया | काशीयात्रा, पाद्पूजा, हल्दी हर एक संस्कार को भेदभावपूर्ण करार दे दिया गया | और यहाँ तक कह दिया गया कि शादी एक औरत को कानूनी रूप से एक आदमी की निजी भोग-विलास की वस्तु बनाने का माध्यम भर है |

हमारे इस आधुनिक समाज की विवाह के हर संस्कार में कमियाँ निकालने की इस कोशिश का परिणाम यह हो रहा है कि हमारे देश के युवा शादी के नाम से या तो भागते हैं या फिर इसे सिर्फ एक औपचारिकता मात्र समझ कर परिवार के दबाव पर जबरदस्ती कर लेते हैं | वे कपड़ों, गहनों, नाच-गाने, पार्टी और पैसे के दिखावे के बीच कुछ दिनों सबके ध्यान का केंद्र बन जाते हैं और फिर बिना ज्यादा सोचे समझे एक नए जीवन की ओर बढ़ जाते हैं | पर इस तरह सिर्फ नाममात्र की शादी करने का परिणाम उनके ही जीवन पर भारी पड़ता है | उनका रिश्ता ताश के पत्तों के उस महल की तरह होता है जो जरा सी हवा लगते ही गिर जाता है | यहीं युवा ज़रा सी घटना होने पर एक दूसरे को न्यायालय तक घसीट ले जाता है | एक दुसरे पर झूठा आरोप लगाता है और एक दूसरे को सिर्फ पैसा ऐठने का माध्यम बना लेता है | तो जो रिश्ता आपसी समझ का था, जो एक दूसरे की प्रेरणा बनने का था, जो एक दूसरे का साथ देते हुए धर्म के हित में कार्य करने के लिए बना था, वो अब कहीं लुप्त होने लगा है | तो सवाल यह उठता है कि ऐसे में शादी का आज के आधुनिक समय में क्या स्थान है ? क्या इस प्रपंच में पड़ने का कोई कारण है या फिर हम सिर्फ सालों से चली आ रही इस रूढ़ि का बोझ यूं ही ढोते जा रहे हैं ?शादी के आधुनिक समाज में स्थान को समझने के लिए पहले हमें शादी के महत्त्व को समझना होगा | क्या यह सिर्फ एक पितृसत्तात्मक समाज का थोपा हुआ बंधन है या फिर इसका कोई महत्त्व भी है ?

हिन्दू पद्धति में विवाह के तीन स्तंभ माने जाते हैं- धर्म, प्रजा और रति | रति का तात्पर्य है कामेक्षा | जो कि उम्र के एक पड़ाव में आने के बाद लड़को और लड़कियों दोनों के मन में आती है | यह रति ही प्रजा का कारक है | बिना रति के प्रजा नहीं | साथ ही रति को विवाह का साधारण धर्म माना गया है क्योंकि बिना रति के विवाह का कोई तात्पर्य ही नहीं | इसलिए अगर एक वैवाहिक जीवन में रति नहीं तो धर्म भी नहीं | हिन्दू धर्म में पत्नी को धर्मपत्नी कहते हैं, वो जो धर्म के रास्ते में पति के साथ चले, वो जो पति को धर्म के मार्ग से भटकने ना दे, वो जो धर्म के कार्य में पति की सहचारिणी बने, वो जिसके बिना पति को धार्मिक अनुष्ठानों की अनुमति ही नहीं | धर्मेच अर्थेच कामेच इमां नातिचरामि | धर्म, अर्थ, काम सबमें पति-पत्नी एक दूसरे को पीछे छोड़ आगे नहीं बढ़ सकते, इस कारण ही पत्नी को सहचारिणी भी कहते हैं |

महाभारत के आदिपर्व में पत्नी को अर्थ, प्रजा, शरीर, धर्म, समाज, स्वर्ग और पितृओं का रक्षक बताया गया है | शान्ति पर्व में बोला गया है कि एक पत्नी के समान कोई मित्र नहीं, एक पत्नी के समान कोई सहारा नहीं | ना ही पत्नी के समान लोक में धर्म के संग्रह में कोई सहायक है | और एक पति के लिए आदि पर्व में कहा गया है कि किसी भी आदमी को गुस्से में भी ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए जिससे उसकी पत्नी सहमत ना हो क्योंकि किसी भी घर की सुख, शान्ति और उन्नति पत्नी पर ही निर्भर करती है| तो इस प्रकार से शादी सिर्फ किसी की कामेक्षा को कानूनी रूप से पूरा करने का माध्यम नहीं है, बल्कि शादी धर्म के मार्ग में एक दूसरे के प्रेरक बनकर, अपनी इच्छाओं की पूर्ति करते हुए, नए जीवन को आयाम देते हुए, अपने सम्पूर्ण जीवन को सफल बनाना है | ताकि जब आप मृत्यु के निकट हों और पीछे मुड़कर अपने जीवन की ओर देखें तो आपको सम्पूर्णता का आभास हो ना कि अकेलेपन और पछतावे का |

जब आजकल के युवावर्ग की बात करें तो शादी के तीनों स्तम्भ लडखडाने की हालत में दिखते हैं | एक बेहतर जीवन के चक्कर में युवावर्ग अपनी शादी को टालता जाता है | पर क्योंकि शादी को टालने से कामेक्षा तो टल नहीं सकती तो वह या तो अपनी कामेक्षा को दबाता चला जाता है या फिर उसमें इतना रम जाता है कि उससे आगे उसे कुछ दिखता ही नहीं | वन नाईट स्टैंड या लिविंग इन जैसे आविष्कार उन्हें कुछ समय खुश होने और दुनिया जीत लेने का अहसास तो दिलाते हैं, पर समय के साथ जैसे जैसे उम्मीदें बढ़ती हैं, व्यक्ति निराशा और अकेलेपन का शिकार होने लगता है | इसका कारण यह है कि आज का युवा जिम्मेदारी नहीं लेना चाहता | वह शादी नहीं करना चाहता क्योंकि वह किसी बंधन में बंधे बिना आजादी से जीना चाहता है | क्योंकि उसे लगता है कि जैसे ही उसने शादी की और उसके बच्चे हुए, वह जिम्मेदारियों के बोझतले दब जाएगा | वो इसे जीवन के समाप्त होने के बराबर समझता है | समस्या यह है कि वह शादी के सिर्फ रति और प्रजा स्तम्भ को देख पाता है और धर्म का बोध ही उसे नहीं होता | वह यह भूल जाता है कि शादी का रिश्ता सिर्फ शारीरिक सम्बन्ध बनाने या बच्चे पैदा करने तक सीमित नहीं है | यह रिश्ता है एक ऐसे साथ का जो हर सुख दुःख को एक दूसरे का हाथ थामकर पार करने की शक्ति देता है | यह रिश्ता साथ में अपने सपनों को पूरा करने, समाज के हित में कार्य करने और एक दूसरे को उस आयाम तक पहुंचाने का है जिस पर आप गर्व कर सकें | वरना ऐसी उन्नति किस काम की जिसकी ख़ुशी आप किसी से बाँट ना सकें और ऐसा जीवन किस काम का जो देश और धर्म के हित में ना हो ?

तो संक्षेप में एक आदर्श रिश्ता क्या है, इसको हम दो शब्दों में परिभाषित कर सकते हैं: सहधर्म और संभोग | संभोग यानि कि जीवन के हर क्षण को साथ में अनुभव करना | चाहे वो अच्छे पलों का आनंद लेना हो या फिर साथ में दुःख का सामना करना | और सहधर्म यानि कि साथ में गृहस्थ धर्म का पालन करना और चारों पुरुषार्थों धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को अर्जित करने का प्रयत्न करना | जो पति पत्नी साथ में जीवन के हर क्षण का आनंद लेते हुए धर्म के मार्ग पर चलते हैं वहीँ आदर्श वैवाहिक जीवन को परिभाषित करते हैं |

तो अगर सनातन धर्म में शादी को इस तरह से परिभाषित करते हैं तो फिर इसके विवाह संस्कार में लोगों को इतनी कमियाँ कैसे मिलती हैं ? क्यों ये लोगों को भेदभावपूर्ण लगते हैं ? इसका उत्तर बहुत ही सीधा है | अगर हम नारीवाद का चश्मा लगाकर किसी भी रीति को देखेंगे तो हमें उनमें कमियाँ ही नजर आएँगी | क्योंकि नारीवाद का अस्तित्व ही इस एक आधार पर टिका है कि नारियों को पुरुषों से नीचे देखा जाता है | जब कि सनातन धर्म ना तो नारी को पुरुष से नीचे देखता है ना ही ऊपर | सनातन धर्म लोगों के अधिकारों तक सीमित नहीं बल्कि यह स्वधर्म की बात करता है | एक स्त्री और पुरुष के स्वधर्म अलग हैं क्योंकि उनकी क्षमता और गुण अलग हैं | वे साथ में तभी खुश रह सकते हैं जब वे अपने अधिकारों से ऊपर उठकर अपने स्वधर्म को समझें और उनका पालन करें |

सनातन धर्म के विवाह संस्कारों को जब हम समय के साथ जुड़ गयी कुछ कुरीतियों से अलग करके उन्हें उनके सही स्वरूप में समझने की कोशिश करेंगे तो हम पायेंगे कि प्रत्येक विवाह संस्कार एक स्त्री और पुरुष को उनके आने वाले वैवाहिक जीवन को मंगल बनाने और उनके मन में एक दूसरे के प्रति घनिष्ठता और मित्रता का भाव लाने का प्रयास करते हैं | विवाह के समय लिए जाने वाले सप्तपदी में बोले जाने वाला यह मन्त्र एक पति पत्नी के रिश्ते की उसी घनिष्ठता का साक्षी है-
सखा सप्तपदा भव
सख्यं ते गमयं सख्यात्ते मायोषं
सख्यान्मे माँ योष्ठास्मयाव
संकल्पावहै संप्रियौ रोचिष्णु सुमनस्यमानौ
इषमूर्जमभिसंवसानौ सन्नौ मनांसि
संव्रता समु चित्तान्याकरम् ||
इन सात पदों के साथ तुम मेरे/मेरी साथी बनो | मैं तुम्हारे साथ की अपेक्षा रखता/रखती हूँ, तुम कभी भी इस साथ को मत त्यागो | हम साथ चलें | हम साथ में उद्दयम करें | हम एक दूसरे से प्रेम करें और एक दूसरे का श्रेयस बढ़ायें | हमारे वचन समरूप हों और हमारी आकांक्षाएँ अनुकूल हों |

इसलिए एक आदर्श रिश्ता वह है जिसमें पति पत्नी एक दूसरे के प्रतिस्पर्धी नहीं बल्कि एक दूसरे के प्रेरक होते हैं | वे विषम परिस्थिति में एक दूसरे का साथ छोड़कर भाग नहीं खड़े होते | वे अपनी जिम्मेदारियों को मजबूरी का नाम देकर अपना पल्ला नहीं झाड़ते; बल्कि वे निरंतर एक दूसरे की उन्नति के लिए कार्यरत रहते हैं | शादी सहयोग है, समझौता नहीं | सम्भोग है, स्पर्धा नहीं | सहधर्मचारिता है, शक्ति प्रदर्शन नहीं |

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