स्वामी सत्यमित्रानँद जी-राष्ट्रीयता के प्रतीक

सन् 60 के दशक की घटना है, मै उस समय नवीँ कक्षा का छात्र था,राजस्थान के छोटे से कस्बे बाँसवाडा के पृथ्वी क्लब के मैदान मे एक सम्मेलन था,जिसमेँ तत्कालीन महाराणा मेवाड भगवत सिँह जी ,विश्व हिँदू परिषद के प्रथम महामँत्री तथा एक गौरवर्ण युवा तेजस्वी सँन्यासी आये थे,
संन्यासी शारीरिक रुप से जितने प्रभावी थे उससे भी अधिक ओजस्वी उनकी प्रभावपूर्ण वाणी थी,उन्होने अपने प्रवचन की शुरुआत मेँ कहा कि जिस मँच पर कहा कि
“जिस मँच पर साहित्यकार, शूर और सँन्यासी साथ होते है, वह कभी निष्फल नही होता है”
आज जब पूज्य स्वामी सत्यमित्रानँद जी के ओजस्वी जीवन को देखते है तो उनमेँ साहित्यकार , शूर और सँन्यासी के अलावा सोशल इँजीनियर, उपदेशक,कवि, समाज सुधारक ,शिक्षक और क्राँतिधर्मी जैसे अनेक गुण प्रकट होते है,
आज से 87 वर्ष पूर्व आगरा के एक ब्राह्मण परिवार मेँ आपका जन्म और प्रारँभिक शिक्षा हुई,उसके बाद युवावस्था मेँ ही आप मध्यप्रदेश के भानपूरा पीठ मे शँकाराचार्य नियुक्त हुए,तभी से देशाटन प्रवचन प्रारँभ हुआ,विदेश मे हिँदू धर्म के प्रचार के लिये एसे ही प्रभावी वक्ता की आवश्यकता समय की माँग थी,
शँकराचार्य समुद्र के पार न जाये एसा उस समय नियम औऱ परँपरा थी ,मरायादा का उल्लँघन न हो इसीलिये शँकाराचार्य का पद ही त्याग दिया.और पूरा समय मानव धर्म और दिक् धर्म के प्रचार के लिये लगा दिया
एक सँत के रुप मेँ गीता और रामायण पर आपके उपदेश विदेशोँ मेँ बहुत लोकप्रिय होते थे,पर आप केवल प्रवचन ही नही देते थे, आप समाज मे व्याप्त कुरीतियोँ को भी एक सोशल इँजीनियर के रुप मे ठीक करने का प्रयास करते थे,
आपने समाज मे फैले छूआछूत को दूर करने के लिये कुँभ मे स्वयँ सफाईकर्मियोँ के साथ स्नान किया .जँगल मे रहने वाले जनजाति बँधुओँ के टापरोँ मेँ बोजन कर समाज मे सौहार्द्र का वातावरण बनाने का प्रयास किया .हिँदू समाज के सँगठन की दिशा मे एक सँत ने हिँदू धर्म के समावेशी स्वरुप का परिचय देकर स्वधर्म का गौरव बढाया.
एक साहित्यकार के रुप मे आपके द्वारा लिखा गया साहित्य आने वाली पीढियोँ का मार्गदर्शन करने मेँ अत्यँत प्रभावी है,समाज के सभी तबकोँ मेँ समन्वस स्थापित करने के साथ ही समस्त धर्म गुरुओँ के मध्य भी सद्भावना का बीज आपने बोया,
एक गुरु के रुप मे आपने स्वामी अवधेषानँद जी जैसे शिष्य का निर्माण कर समाज को एक नवीन चैतन्य स्वरुप पूँजी प्रदान की,स्वामी रामदेव की योग कला को पहचान कर उनकी प्रारँभिक यात्रा मे आपने अपना आशीर्वीद मुक्त हस्त से दिया.
गायत्री परिवार शाँतिकुँज हरिद्वार के सँस्थापक परम पूज्य श्री राम शर्मा ने तप करते एक युवा सँन्यासी के उज्जवल भविष्य को पहले ही पहचान लिया था,इसीलिये उन्हेँ राम मँत्र के साथ गायत्री मँत्र को जपने की सलाह दी,वे स्वयँ गृहस्थ सँत थे अत: स्वामी सत्यमित्रानँद जी को प्रतिवर्ष अामँत्रित करते थे और अपने चौक मे भोजन करवाते थे
स्वामी सत्यमित्रानँद जी साक्षात सेवामूर्ति थे,समन्वय सेवा ट्रस्ट, भारतमाता जनहित ट्रस्ट,स्वामी सत्यमित्रानँद फाउँडेशन आदि के माध्यम से निशुल्क आवासीय वेद विद्यालय,गौशाला, चिकित्सालय और वृद्धाश्रम तो नियमित चलते ही है इसके अलावा आपने अपने पिछले जन्मदिन पर उन्होने झाबुआ क्षेत्र के गरीब जनजाति के भाइयोँ और बहनोँ को हरिद्वार आमँत्रित कर गँगादर्शन करवा कर सोने का सिक्का भेँट किया. नर मेँ ही नारायण का दर्शन करने वाले एसे तपस्वी सँत का आशीर्वाद हिँदू समाज के वँचित वर्ग को समय समय पर मिलता रहा है
भारत की सर्जिकल स्ट्राइक और एयर स्ट्राइक की सफलता सेना के निपुण जवानोँ को शौर्य और पराक्रम का परिणाम तो है ही पर उसमेँ इस देश के आध्यात्मिक तत्व का भी बहुत ब़डा हाथ रहा है, गत वर्ष स्वामी जी ने हमारी कोई जन हानि न हो इस हेतु एक विशाल राष्ट्र रक्षा यज्ञ करवाया था.
यज्ञ शक्ति के एसे ही चमत्कारी शक्ति के परिणाम का पूर्व मेँ भी एक उदाहरण है.1962 मे चीन के साथ हुए युद्ध मे चीन जब लगातार हमारी सीमाओँ मे घुसता चला आ रहा था तब काशी के पँडितोँ ने बहुत बडा यज्ञ किया था और पूर्णाहुति का मुहूर्त निकालकर पहले से बता दिया था कि किस दिन से चीन की विजय यात्र का रथ थम जायेगा,और ठीक उसी दिन न केवल चीन ने एकतरफा युद्ध विराम की घोषणा की वरन भारतीय क्षेत्र भी खाली किया
एक शूरवीर के रुप मे वे देश रक्षा के लिये सतत जागरुक रहे,उनके द्वारा स्थापित भारत माता मँदिर मे सारे देवी देवताओँ की जन्मभूमि और भारत माता की साक्षात देवी के रुप मे पूजा की जाती है.हरिद्वार मे सप्तसरोवर क्षेत्र मेँ सात मँजिला भारत माता मँदिर मेँ एक खँड देश के लियेबलिदान हुए योद्धाओँ का है.1983 मे इस मँदिर के उद्घाटन मे तत्कालीन प्रधानमँत्री इँदिरा गाँधी जी तथा तत्कालीन सँघचालक जी दोनोँ पधारे थे,
इँदिरा गाँधी की हत्या के बाद सामाजिक सद्भावना की पुनर्स्थापना हेतु आपने स्वर्ण मँदिर तक एखता यात्रा निकाली.
न केवल भारत सरकार ने आपको पद्म विभूषण से सम्मानित कर अफने कर्तव्य का निर्वहन किया वरन विश्व के कई देशोँ ने आपके सम्मान मेँ डाक टिकीट और सिक्कोँ को जारी कर आपके मानवीय कार्योँ के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट की,
विश्व को एक परिवार के स्वरुप मे आपने बाँधने का अलौकिक कार्य किया
अँत मे एक विलक्षण विशेषता का उल्लेख आवश्यक है.इतना ऊँचा व्यक्तित्व होने के बावजूद आप एक सरल हृदय व्यक्ति थे,आपका मन बहुत कोमल और करुणा से भरा था.
पिछले माह अत्यँत रुग्णावस्था मेँ जैसे मृत्यु की प्रतीक्षारत होँ, आपने मुझ जैसे अकिँचित औऱ अतिसाधारण व्यक्ति को अपने हाथोँ से लिखकर अपना आशीर्वाद प्रदान किया था-
“मानव जीवन परमात्मा का प्रसाद है,इसमेँ सत्कर्म करना व प्रभु स्मरण करना चाहिये”
मेरे विचार से यह मानव मात्र को उस महामानव का एक महान उपदेश है

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