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।। सुषुम्ना साधना ।।

डॉ० राजेश कुमार मिश्र
(सीनियर नेचरोपैथ)
संस्थापक- कायाकल्पकेन्द्रम् (हरदोई)
९४५३३५०५०७
अनन्त ब्रह्मांड में प्राणतत्व ही चेतना समुद्र की तरह हिलोरें ले रहा है। विश्वव्यापी शक्ति चेतना ही ‘प्राण’ है। प्राण मात्र श्वांस नहीं है प्रत्युत वह तत्व है जिससे श्वांस-प्रश्वांस आदि समस्त क्रियायें एक जीवित शरीर में होती हैं।
शरीर और मन प्राणशक्ति से ही चलते हैं। प्राणवायु को वश में करने की विधि जानने वाला अपने शरीर तथा मन की प्रत्येक क्रिया पर नियंत्रण रखने की क्षमता से सुसम्पन्न हो जाता है। इसप्रकार के सभी विधि-विधान प्राणायाम विद्या के अन्तर्गत आते हैं।
महर्षि पतंजलि की योगसाधना के आठ अंग हैं।
१- यम २- नियम ३- आसन ४- प्राणायाम ५- प्रत्याहार ६- धारणा ७- ध्यान और ८- समाधि।
यम-नियमों के पालन तथा आसन सिद्धि के पश्चात् श्वांस-प्रश्वांस की गति के अवरुद्ध हो जाने का नाम प्राणायाम है।
तस्मिन सति श्वासप्रश्वासयोर्गति विच्छेदः प्राणायाम:। (योगदर्शन २/४९)
महर्षि पतंजलि ने ४ प्रकार के प्राणायाम बाह्य, आभ्यन्तर, स्तम्भवृत्ति और बाह्याभ्यंतरविषयाक्षेपी बताये हैं।

।। इड़ा – पिंगला और सुषुम्ना ।।
मनुष्य नाक से श्वांस लेता व छोड़ता है। नासाद्वार में रोम व श्लैष्मिक झिल्ली पायी जाती है।
बायें नासारन्ध्र को इड़ा (चंद्र स्वर) और दायें को सूर्य स्वर तथा जब दोनों स्वर एक साथ तथा जब दोनों स्वर एक साथ और एक जैसे चल रहे हों तो सुषुम्ना स्वर कहा जाता है।
संसार में हम देखते हैं तो पाते हैं कि लोग इड़ा और पिंगला में ही सारी जिन्दगी गुजार देते हैं। मध्य स्थान सुषुम्ना सदैव निष्क्रिय रहता है। पुरुषार्थ के अभाव में लोगों की सुषुम्ना नाड़ी निष्क्रिय रहती है लेकिन सुषुम्ना मानव शरीर का सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू है। जब ऊर्जा सुषुम्ना नाड़ी में प्रवेश करती है तब जीवन का प्रारम्भ होता है।
सुषुम्ना के महत्त्व का वर्णन अनेक ग्रन्थों में मिलता है। सुषुम्ना साधना से बड़ा तीर्थ, जप और ध्यान कुछ भी नहीं है। सुषुम्ना ही परमगति है।
दर्शनोपनिषद में कहा गया है-
अश्वमेध सहस्त्राणि वाजपेय शतानि च। अर्थात् सुषुम्ना साधना का फल अश्वमेध तथा वाजपेय यज्ञों से अधिक है।

?मैं और सुषुम्ना साधना?
मैंने सोचा ही नहीं था कि मेरे प्राण कभी सुषुम्ना में प्रवाहित होंगे। इस विषय में पढ़ा तो था। परमात्मा की कृपा से ही ऐसा हो रहा है। बैठे होने की स्थिति में सदैव मेरी सुषुम्ना नाड़ी चलती है। इस लेख को लिखते समय भी अपनी सुषुम्ना नाड़ी को चलते हुए देख रहा हूँ। यह सर्वविदित है कि पंचतत्वों से शरीर का निर्माण हुआ है। प्रकृति से लगाव तो बाल्यावस्था से ही था पर जब मैं प्राकृतिक चिकित्सक बना तो प्रकृति प्रेम अत्यधिक बढ़ गया। स्थिति यह हो गयी कि हरे-भरे स्थान के अभाव में रहना असम्भव हो गया। प्रभु कृपा से हरे-भरे स्थान भी मिलते रहे। प्राकृतिक चिकित्सा के साथ योग का भी अध्ययन कराया और सिखाया जाता है। कहा जाता है कि योग और प्राकृतिक चिकित्सा एक गाड़ी के दो पहिये हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि प्रकृति से निकटता, प्राकृतिक आहार का सेवन, नित्य यज्ञ और यम-नियमों का पालन करते हुए यज्ञोपरान्त प्राणायाम करने से “सुषुम्ना नाड़ी” सक्रिय हो जाती है। मैंने इतना ही किया है और यह सोचकर नहीं किया था कि मैं सुषुम्ना साधना कर रहा हूँ। नियमों का पालन करते-करते स्वतः ही सुषुम्ना नाड़ी जाग्रत हो गयी।
आहार और यम-नियम की इसमें बड़ी भूमिका है।
संस्कारों का अपना महत्त्व है। माता-पिता के विवाह के बारह वर्ष बाद मेरा जन्म हुआ था। भारतीय संस्कृति गीता-रामायण की संस्कृति है। माताजी ने बारह वर्षों तक खूब तप किया और गर्भकाल में भी उनकी सात्विक भक्ति बनी रही। उसके बाद वे बाल्यकाल में कहानियों आदि से प्रेरित करती रहीं। जब दस वर्ष का हुआ तो ग्यारहवें वर्ष में यज्ञोपवीत कर दिया गया। गायत्री मंत्र का जप, मानस पाठ करने लगा। यह संस्कारों का प्रभाव बता रहा हूँ। तीन वर्षों से कुछ अधिक समय हो गया है तब से निरन्तर सुषुम्ना नाड़ी चलती है। जब सोता हूँ तब सुषुम्ना बन्द हो जाती है। सुबह उठता हूँ तो स्वर विज्ञान के अनुसार धरती माता को प्रणाम करके उस पर कौन सा पैर रखूँ, इसको लेकर जब स्वर देखता हूँ तो पता चलता है कि दोनों स्वर चल रहे हैं। अब क्या किया जाये ऐसी स्थिति में दाहिना पैर रखता हूँ और दिनचर्या प्रारम्भ कर देता हूँ। मैंने किसी से पूछा भी नहीं कि ऐसी अवस्था में कौन सा पैर रखना चाहिए क्योंकि मैंने कई चर्चित आचार्यों से पूछा कि सुषुम्ना के वारे में उनकी क्या राय है तो सब पढ़ा और सुना हुआ बताने लगे। अपनी मर्जी से चलता जा रहा हूँ। लाभ ही लाभ हैं। हाँ अब ऐसा हो गया है कि अपने स्थान से इधर-उधर जाने की इच्छा नहीं होती। कुछ पाने की लालसा नहीं है और सबकुछ पा लिया है ऐसा भी नहीं है। यज्ञ और मौन के बिना नहीं रह सकता। कुछ दिनों पूर्व तो चालीस दिन मौन रहा। मैं कोई बड़ा साधक हूँ, दूर-दूर तक ऐसा भाव नहीं है। एक-दो वर्ष तो मैंने इसकी चर्चा ही नहीं की। यज्ञ अथवा मेरी चिकित्सा में आने वाले कुछ विशिष्ट जनों से अब चर्चा करने लगा हूँ। यदि किसी ऐसे महापुरुष के हाथ में यह लेख लगे जो इस क्षेत्र में आगे बढ़ा हुआ हो तो वह मेरा मार्गदर्शन करने की कृपा करे।

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