माँ ही योग की प्रेरक
बालकोँ को योग के प्रति रुचि पैदा करवाने मे माँ की बडी भूमिका
सँतान की प्रथम शिक्षिका माँ ही होती है , इतिहास साक्षी है कि मातायेँ अपनी सँतान को श्रेष्ठ एवँ आदर्श बना देती है,गर्भस्थ शिशु को भी सुसँस्कारित बनाने का कार्य माँ ने ही किया.
“अभिमन्यु इसका जीता जागता उदाहरण है जो माँ के गर्भ से शिक्षित हुआ था
जीजामाता ने भी अपने देश व धर्म की रक्षार्थ प्रेरणा लेकर उसी प्रण अनुरुप शिवाजी को तैयार किया, इतिहास मे यह साक्ष्य दिया है कि अगर माँ दृढ निश्चय हो जाये तो अपनी सँतान को उसी अनुरुप रुप दे सकती है जैसा वह चाहती है,
जननी जणे तो भक्त जण,कां दाता कां शु
हे जननी ,यदि तुझे जन्म देना है तो भक्त,दानी या वीर को जन्म देना.सँतान की जीवन वाटिका को सद्गुणोँ के फूलोँ से सुशोभित करने से स्वयँ माँ का जीवन भी आनँदमय बन जायेगा,सँतान ने यदि दुर्गुण के काटे पनपेँगे तो वे माता को भी चुभेँगे अत:माता का दायित्व ही नही पर वह कर्तव्य भी है कि सँतान को शारीरिक ,मानसिक,बौद्धिक, नैतिक ,आध्यात्मिक सँरक्षण और पोषण का आदर्ष माता बन पाये
वर्तमान युग मे जीवन बहुत कठिन सा हो गया है,भागती दौडती जिंदगी किसी को किसी के लिये समय नही,सभी कार्योँ का स्थान मशीनोँ ने ले लिया है जो सभी कार्य बिना मशीनरी के होते थे,तकनीकि ने उनको पूर्ण रुप से बदल दिया है,इस प्रकार के भौतिक युग मेँ चकाचौँध व मशीनरी कार्योँ ने शरीर का स्वस्थ रहना अत्यँत आवश्यक हो गया है,हर माँ का स्वपन है कि उसकी सँतान अच्छा पढ लिखकर अच्छे पद पर आसीन हो परँतु केवल पढने मात्र से ही एसा स्वप्न साकार नही होगा,इसके लिये आवश्यक है बच्चे के स्वास्थ्य का चिँतन प्रारँभ से ही करना
हजारोँ साल पहले हिमालय मे आदीयोगी ने योग ज्ञान को प्रसिद्ध सप्तऋषि को दिया था,सप्तऋषियोँ ने योग के इस विज्ञान को एशिया,मध्य पूर्व उत्तरी अफ्रीका एवँ दक्षिण अमेरिका सहित दुनिया के कोने कोने मे पहुँचाया.लोक परँपराओँ सिधु घाटी सभ्यता वैदिक एवँ उपनिषद की विरासत वैद्य एवँ जैन परँपराओँ दर्शनोँ महाभारत एवँ रामायण नामक महाक्व्योँ एवँ तांत्रिक परँपराओँ में योग की मौजुदगी है
आवश्यकता है तो केवल हर माँ अपनी सँतान मेँ बाल्यकाल से ही योग का बीज दे जिससे कि बालक जो कि एक कोमल पौधा जैसा है उसे चाहे जिस दिशा मेँ मोडा जा सकता है उसे अपने स्वस्थ जीवन जीने की राह मिल सके,
माँ स्वयँ योग करके स्वस्थ रहते हुए पल पल मेँ सँतान को योग के प्रति प्रेरित कर सकती है,प्रात: कालीन उठकर माँ स्वयँ जब योग करे तो बच्चे को उसका महत्व बताते हुए अपने पास योग करने के लिये प्रेरित करे,धीर् धीरे हँसे हँसते बच्चे को शवाँस लेने छोडने की प्रक्रिया को समझाया जा सकता है,योग विद्या बहुत बडी है,कुछ एसे आसन है जो बच्चे को रुचिकर लगते है,
उन आसनोँ को प्रारँभ मे कराकर बच्चे को योग के प्रति रुझान लाना अति आवश्यक है,
सुखासन करवाकर बच्चे को पीठ सीधा रखकर बैठाना,सीखा माँ बच्चे के साथ इस आसन मेँ बैठ बच्चे को ब्रेन पावर को बढा सकती है एवँ आगे बच्चे को मेडीटेशन के लिये प्रेरित भी कर सकती है
दँडासन से रीढ की हड़्डी सीधी रहती है.यब बैठऩे के पोश्चर को बेहतरीन बनाता है इसे रोजाना करने से शरीर लचीला हो जाता है,
एक पादासन से बच्चे को विशेष आनँद होता है ,यह शरीर के आलस को दूर करके शरीर को फुर्तीला बनाता है
माँ खेल खेल मेँ बच्चे को भुजँगासन भी करवा सकती है,जो बच्चे के लिये फायदेमँद है
छोटे छोटे खेल वीर कहानियोँ के माध्यम से बच्चे को एकाग्रता ध्यान के प्रति रुचिकर किया जा सकता है
इसी प्रकार प्रणाम आसन ,हस्तोस्तानासन,हस्तपादासन,अश्वसँचालनासन ,अष्टाँग आसन,नमस्कारर, पर्वतासन,वृक्षासन आदि बच्चे को माँ आसानी से करवा योग के प्रति बच्चे मेँ रुचि पैदा करा स्वास्थ्य के प्रति जागरुक किया जा सकता है,
योग एक एसी विद्या है जो प्रारँभ से ही माँ अपने बच्चोँ को देकर उनके जीवन को स्वर्णिम बना सकती है,इसके लिये आवश्यक है माँ स्वयँ भी दैनिक योग करेँ,इसे देखकर ही बच्चोँ मे यह प्रवृत्ति स्व विकसित होती है.योग को उदासीन न बनाते हुए माँ रुचिकर बनाकर बच्चोँ को दे सकती है
अत: माँ को दैनिक दिनचर्या मेँ बच्चोँ को योग शिक्षा देकर भविष्य की नव सु सँस्कृति स्वास्थ्यवर्द्धक पीढी का निर्माण करना है,माँ ही बच्चोँ की भविष्य की सीढी है,
वँदना वजीरानी
प्रबँधक निदेशक
चित्तौडगढ अरबन को-ओपरेटिव बैँक लि. चित्तौडगढ

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